Monday, 11 June 2012


o        महसूस करने को यूँ तो एक उम्र भी कम थी
न जाने आज क्यों मेरी शाम ने तुम्हे माँगा है
o        यूँ तो कम न था सिगरेट की तरह जलने में मज़ा
आज न जाने क्यों आंच बन झुलसने को मन हुआ

?

by Preet Paul Hundal on Tuesday, May 1, 2012 at 1:23am ·
ਰਿਸ਼ਤਿਆਂ ਦੀ ਮਹਿਫਿਲ'ਚ
ਚਰਚਾ ਸੀ ਉਸਦੀ ਖੁਸ਼ੀ ਦਾ
ਹੈਰਾਨੀ ਦਾ ਪਸਾਰਾ ਸੀ ,
ਪਰੇਸ਼ਾਨੀ ਵੀ ਨੁਮਾਇਆਂ ਸੀ
ਔਰਤ ਹੋ ਕੇ ਹੱਸਦੀ ਹੈ ?
ਗਮਾਂ ਕੋਲੋਂ ਨਸਦੀ ਹੈ ?
ਗਿਲਾ ਕੋਈ ਕਰਦੀ ਨਹੀਂ
ਦਰਦ ਕੋਈ ਜਰਦੀ ਨਹੀਂ
....ਬੜੇ ਪਰੇਸ਼ਾਨ ਸਨ
ਡਰਦੀ ਨਹੀਂ ਸੀ.....
ਹੱਥ ਕੋਈ ਫੜਦੀ ਨਹੀਂ ਸੀ
 ..........................
ਪਰਛਾਵਿਆਂ ਤੋਂ ਲੈ ਰਹੇ ਨੇ
ਮੇਚਾ ਉਸ ਸੰਗਲ ਲਈ....
ਜਿਸ ਨੂੰ ਤੋੜਣ ਲਈ  ਮਾਰਿਆ
ਉਮਰ ਜਿਡਾ ਹੰਭਲਾ  ਸੀ.
..........................
ਰਿਸ਼ਤਿਆਂ ਦੀ ਮਹਿਫਿਲ'ਚ
ਚਰਚਾ ਸੀ ਉਸਦੀ ਖੁਸ਼ੀ ਦਾ
..

ज़िन्दगी एक रंगीन चलचित्र

by Preet Paul Hundal on Thursday, May 17, 2012 at 8:03pm ·
ज़िन्दगी एक रंगीन चलचित्र  की मानिंद शुरू होती है ----
संगीत ,सुंदर नज़ारे ,मुहबत भरी बातें  वगैरा वगैरा------
फिर धीरे धीरे हम घिसने लगते हैं
चलचित्र के रंग उड़ने लगते हैं
लफ्ज़ बीमार नायक की तरह साथ छोड़ने लगते हैं
हर किरदार पे एक चुप्पी छाने लगती है ,
चुप्पी में हम महफूज़ रहते हैं
हमें इससे  प्यार हो जाता है
फिर व्ही प्यार  कैदगाह लगने लगता है
हम चीखते हैं  बाहर निकलने के लिए
  कैदगाह जकडत है बाहों में
निगाहों में ......
हम और जोर से चीखते हैं .......
बच्चे  कह रहे हैं शोर बंद करो
हम मुंह पे हाथ रख लेते हैं ...
 चीख हवा  बन कर उँगलियों में से सरकती है
और हंसी का फुवारा बन  जाती है ....
कैरम में मन लगाते हैं
नन्हे से जोक पे ठहाका लगाते हैं
बच्चों को नाटक कर के दिखाते हैं
बहुत बड़े अभिनेता हो गए हैं अब
चलचित्र का संगीत संजीदा हो गया है
वक़्त बहुत कम है जीने के लिए.......

आखिर क्यों

आखिर क्यों

by Preet Paul Hundal on Tuesday, May 22, 2012 at 9:14pm ·
 आखिर क्यों
क्यों नहीं करते हम  प्रेम 

वैसे  .... जैसे बच्चे खेलते हैं कोई खेल
 हार जीत की परवाह किये  बिना
इतना खुश होते हैं की
 लाल सुरख़ हो जाते हैं चेहरे
कितना आनंद ....
आनंद की चरम सीमा ...

घर  जाते वकत नहीं देखते   पीछे मुड़ कर
एक यकीन के साथ , मिलेंगे कल फिर
और खेलेंगे ख़ुशी के लिए
क्यों नहीं करते प्रेम

वैसे  .... जैसे बच्चे खेलते हैं कोई खेल
बिना किसी डर के ,जब जी चाहे निकल देते हैं ‘

उसको खेल से….जो  खलल डालता है
और फिर खेलने लगते हैं यूँ के यूँ

एक नया खेल
तह करते हैं अपने नियम
तह करते हैं अपना दायरा…. सहमती से
क्यों नहीं करते प्रेम
वैसे  .... जैसे बच्चे खेलते हैं कोई खेल
कितनी बेसब्री से इंतजार करते हैं
अपनी बारी का ....और टिके रहने की कोशिश करते हुए
लेते हैं भरपूर आनंद ,
जी लेते हैं ज़िन्दगी
जीत लेते हैं ख़ुशी  …..उस एक बारी में
क्यों नहीं करते प्रेम
वैसे  .... जैसे बच्चे खेलते हैं कोई खेल

Saturday, 7 April 2012

लस्‍ट फॉर लाइफ—विंसेंट वैनगो

लस्‍ट फॉर लाइफ—विंसेंट वैनगो
**********************

यह कहानी है उत्‍तप्‍त भावोन्‍मेष की, सृजन के विवश करनेवाले विस्‍फोट की; प्रसिद्ध डच चित्रकार विंसेंट बैन गो की जो अपनी ही प्रतिभा की आग में जीवन भर जलता रहा और अंतत: उसी में जलकर भस्‍मसात हो गया।---------------

विंसेंट अपने माथे पर दो लकीरें बहुत गहरी खुदवाकर लाया था। गरीबी और लोगों की नफरत। वह जिस परिवार में जन्‍मा था उस स्‍तर पर कभी नहीं जी पाया, हमेशा गरीबी में झुलसता रहा। भोजन का अभाव और बुखार उसके सदा के दोस्‍त थे। दूसरा अभिशाप—किसी स्‍त्री का प्रेम उसे कभी नहीं मिल पाया। ऊंचे खानदान की दो स्‍त्रियों से उसने पागलपन की हद तक प्रेम किया। लेकिन दोनों से उसे नफरत ही मिली। और जिन दो स्‍त्रियों ने उसे प्रेम की थोड़ी सी उष्‍मा दी वे दोनों वेश्‍याएं थी। बाजारू औरतें थी। अंत: उनके प्रेम से उसे सदमा अधिक मिला, पोषण कम।

विंसेंट ने कभी पैसे नहीं कमाये। वह हमेशा थियो के पैसों पर जीता रहा। थियो दोनों के गुज़ारे के लिए पैसे कमाता। थियो छाया की तरह विंसेंट का साथ निभाता और उसे भरोसा दिलाता। थियो को यकीन था एक दिन जरूर विंसेंट के चित्रों की लोग कदर करेंगे जो आज उनका मजाक उड़ाते है। विंसेंट के चित्र उसी के जैसे थे। अनगढ़, ग्रामीण, माटी से नाता जोड़ते हुए। उस समय जो अन्‍य चित्रकार थे उन्‍हें विंसेंट अपने चित्र दिखाता। सभी निराशा में गर्दन हिला देते। कहते, ये चित्र बड़े भद्दे और अजीब है। उनमें अनुपात नहीं है। रेखाओं की सुघडता नहीं है। लोग उसे सलाह देते। किसी विद्यालय में जाओ और ठीक से सींखो। लेकिन किसी भी तरह की व्‍यवस्‍था या प्रशिक्षण विंसेंट के आजाद मिज़ाज के अनुकूल नहीं था।

चित्र बनाना विंसेंट की विवशता थी। कोई ऊर्जा उसके भीतर से ज्‍वालामुखी की तरह फूट पड़ती थी और वह उसे कैनवास पर अभिव्‍यक्‍त करता। कुदरत को देखने की उसकी अपनी आँख थी। वह अनेकता में एकता देखता था। अगर खेतों में काम करने वाले किसान के चित्र बना रहा है तो पता नहीं चलता कहां किसानों के शरीर खत्‍म हुए ओर कहां मिट्टी शुरू हुई। क्‍योंकि वह कहता दोनों एक ही मिट्टी से बने है। यदि थियो उसे पैसे और चित्रकला का सामान न भेजता रहता तो विंसेंट कभी का मर चुका होता। और संसार एक अद्भुत चित्रकार से वंचित रह जाता।

आर्ल्‍स के लोग विंसेंट को फाऊ-राऊ कहते थे। ‘’फाऊ-राऊ’’ पागल चित्रकार। विंसेंट कभी-कभी वेश्‍या घरों में जाता था। वहां एक लड़की थी रेशोल, वह विंसेंट से प्‍यार करती थी। वह मजाक में विंसेंट से कहती मुझे तुम्‍हारा कान काटकर दो। तुम्‍हारा कान मुझे बहुत अच्‍छा लगता है। एक दिन पागलपन के दौर में विंसेंट ने सचमुच अपना दायां कान काटकर उसे भेट कर दिया।
यह विंसेंट के पागलपन की शुरूआत थी। इसके बाद हर तीन महीने में फिट पड़ने लगे। उस दौर में वह कुछ भी कर बैठता। इसलिए उसे पागल खाने भरती किया गया। थियो को खबर मिली, वह आकर उसे पेरिस ले गया। दो दौरों के बीच विंसेंट बिलकुल ठीक रहता। अब विंसेंट के चित्रों पर लोगों की नजर पड़ने लगी। कुछ पत्रिकाओं में उसके चित्रों की प्रशंसा में लेख भी छापने शुरू किये। लेकि अब विंसेंट इन बातों से अछूता था। जुलाई के महीने में जब उसे दौरा पड़ने वाला था। विंसेंट के हाथों में एक पिस्‍तौल आ गई। खेतों में चित्र बनाने के लिए गया था, वहीं उसने अपने आपको गोली मार ली।

उसके ठीक छह महीने बाद थियो ने शरीर छोड़ दिया।

कभी-कभार ऐसा भी होता है कि कोई व्‍यक्‍ति इसलिए आत्‍महत्‍या कर लेता है कि वह जीने के लिए समझौता करते-करते थक चूका है। वैनगो ने इसीलिए आत्‍महत्‍या की—वह एक अनूठा आदमी था। महान चित्र कार। लेकिन जीवन में कदम-कदम पर उसे समझौता करना पडा। उन सब समझौतों से वह थक चूका था। अब वह भीड़ की मानसिकता का हिस्‍सा बने रहना वह और नहीं सक सकता था। अपनी निजता पाने के लिए उसने आत्‍महत्‍या कर ली। वह वर्षों से सूर्योदय का चित्र बनाना चाहता था। और जिस दिन उसने वह चित्र पूरा किया उसने सोचा कि अब और कोई समझौता करने की जरूरत नहीं है।

जो उसे जीवन को देना था। वह उसने दे दिया। यदि वह पूर्व में हुआ होता तो उसके पास एक विकल्‍प था। सन्‍यास, क्‍योंकि वह पश्‍चिम में हुआ इसलिए इस विकल्‍प से चूक गया।