Monday, 11 June 2012

आखिर क्यों

आखिर क्यों

by Preet Paul Hundal on Tuesday, May 22, 2012 at 9:14pm ·
 आखिर क्यों
क्यों नहीं करते हम  प्रेम 

वैसे  .... जैसे बच्चे खेलते हैं कोई खेल
 हार जीत की परवाह किये  बिना
इतना खुश होते हैं की
 लाल सुरख़ हो जाते हैं चेहरे
कितना आनंद ....
आनंद की चरम सीमा ...

घर  जाते वकत नहीं देखते   पीछे मुड़ कर
एक यकीन के साथ , मिलेंगे कल फिर
और खेलेंगे ख़ुशी के लिए
क्यों नहीं करते प्रेम

वैसे  .... जैसे बच्चे खेलते हैं कोई खेल
बिना किसी डर के ,जब जी चाहे निकल देते हैं ‘

उसको खेल से….जो  खलल डालता है
और फिर खेलने लगते हैं यूँ के यूँ

एक नया खेल
तह करते हैं अपने नियम
तह करते हैं अपना दायरा…. सहमती से
क्यों नहीं करते प्रेम
वैसे  .... जैसे बच्चे खेलते हैं कोई खेल
कितनी बेसब्री से इंतजार करते हैं
अपनी बारी का ....और टिके रहने की कोशिश करते हुए
लेते हैं भरपूर आनंद ,
जी लेते हैं ज़िन्दगी
जीत लेते हैं ख़ुशी  …..उस एक बारी में
क्यों नहीं करते प्रेम
वैसे  .... जैसे बच्चे खेलते हैं कोई खेल

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