Monday, 26 March 2012

अपना अपना चाँद

यूँ तो मैं कभी उदास नहीं होती
मगर इन्सान हूँ...
 एक जैसी  नहीं रहती ...
जब कभी ऐसा  हुआ
सूरज की  छोटी  सी चिंगारी
रूह  में भर के
बदन का रथ चाँद की और मोड़ दिया
रथ ने रफ़्तार भी कहाँ पकड़ी थी
कि पेड़ों से पत्ते झरने लगे
हवा फुंकारने लगी
बादल  ने भी रूप बदला
अँधेरे ने  रास्ता भर दिया
मैंने कांपते हाथों से रथ कि रस्सियाँ खींच दीं
पेड़ ,हवा, बादल ...अँधेरा ....सब चुप .....
मैंने रूह कि पोटली टटोली
जो हाथ में आया
उसे गूंधा ...बेला....
और एक ......
..............एक चाँद पकाया
बदन का रथ रोज़ उस से मिलने जाता है
पेड़ ,हवा, बादल ...अँधेरा ....सब चुप ....
तुम सब भी टटोलो पोटलियाँ ....
फिर कोई उदास नहीं होगा
यूँ तो मैं  भी कभी उदास नहीं होती.......

No comments:

Post a Comment