Monday, 26 March 2012

वजूद

 मुझे महसूस कर पाना इतना आसान होता तो
क्या नहीं हो सकता था
अगर हो भी जाता कुछ तो
क्या होता .....
और  मुझे महसूस करने  की तुम्हे ज़रुरत भी क्या थी
तुम आखों में डूबे रहे
बाँहों में फैले रहे
जुल्फों में अटके रहे
इस से ज़िआदा तुम थे ही नहीं
वो तो मैं तुम्हे अपनी आखें देती, तो तुम देख पाते
समंदर में सिर्फ पानी ही नहीं होता
कभी डुबकी लगा कर देखना
और वो
पानी की लहरों पे जो कश्तीयें चलती हैं न
वो
सफ़र होती हैं
कभी न ख़तम होने वाला सफ़र
न तुम पानी पे चल सके न डुबकी लगा सके
अगर चलते भी तो क्या होता ........
होना ही तो सब कुछ नहीं होता

No comments:

Post a Comment