जो मिल जाता तुम्हारे
सच से मेरा भी
सच
जो मिल जाती तुम्हारी
दुनिया से
दुनिया मेरी भी
तो हम जरूर मुस्कुराते
साथ साथ
लेकिन तुमने पा लिया है
एक चराग ... नई रौशनी निकलती है
जिससे
और दिखता है सिर्फ़
तुम्हें
तुम्हारा सच
जिसे तुमने हर बार पुकारा
आज़ादी कहकर
और तुम्हारे खैर-ख्वाह
भिडते रहे मुझसे ख्वामख्वाह ..
देखो ... जरा गौर से
कितना बदसूरत हो गया है
समुन्दर का वह किनारा
जहाँ से तुमने उखाड फेका है
वह लहलहाता सा पौधा ...
और नाम दिया मुक्ति ..
सो मौन ही रहना पडा मुझे ...
----- Ravindra k das
सच से मेरा भी
सच
जो मिल जाती तुम्हारी
दुनिया से
दुनिया मेरी भी
तो हम जरूर मुस्कुराते
साथ साथ
लेकिन तुमने पा लिया है
एक चराग ... नई रौशनी निकलती है
जिससे
और दिखता है सिर्फ़
तुम्हें
तुम्हारा सच
जिसे तुमने हर बार पुकारा
आज़ादी कहकर
और तुम्हारे खैर-ख्वाह
भिडते रहे मुझसे ख्वामख्वाह ..
देखो ... जरा गौर से
कितना बदसूरत हो गया है
समुन्दर का वह किनारा
जहाँ से तुमने उखाड फेका है
वह लहलहाता सा पौधा ...
और नाम दिया मुक्ति ..
सो मौन ही रहना पडा मुझे ...
----- Ravindra k das

No comments:
Post a Comment