Saturday, 7 April 2012

रूह कसाई अब भी नहीं बेचता ,

रोज़ मिलने की खवाहिश ,
और ,
कभी ना मिलने के अहद में,
उलझी ज़िन्दगी ,
कसाई की दुकान पर ,हुक से टंगे ,
उल्टे लटके बकरे सी हो गयी है ,
सीने से खून टपकता है ,
कपडा मार कसाई हर नए ग्राहक से ,
पूछ लेता है ,क्या दूं साहिब ?
एक रोता दिल,एक फूंका जिगर ,या फिर
एक बेचैन ज़ेहन ?
********************
रूह कसाई अब भी नहीं बेचता ,
जो मेरे पास नहीं ,
तुम्हारे पास नहीं ,
कैसे बेचेगा ?
हाँ बाँट सकता है हकीमों की मानिंद ,
हमारे दर्द की पुड़ियाँ ,
चाहतों के जंगल में ,पहली बार आये ,
नए सैलानियों को ,
बांटते बांटते बताएगा भी ,
ले जाओ ,पर सो नहीं पाओगे ,
आज के बाद |
-------- deepak arora----

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