जरूरत की पटरियों पर दौडती भागती है साँसों की ट्रेन..... स्टेशन दर स्टेशन पीछे छूटते जाते हैं नए मुकाम!
साथ बस ..... देह की खटर-पटर और अवसाद की काली राख रहती है!
ना जाने कब तक चलती रहेगी यह अविरल यात्रा........
चल रे आवारे !
कोई नया जंक्शन खोज!!
--------- amit anand
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