Saturday, 7 April 2012

प्यार करने , और किताब पड़ने में , कोई फर्क नहीं होता ..

प्यार करने ,
और किताब पड़ने में ,
कोई फर्क नहीं होता ....

कुछ किताबो का हम ,
सिर्फ मुख्य पन्ना ही देखते है ,
अंदर से नीरस होती है ,
पन्ने उलटते है और रख देते है ,
कुछ किताबे हम ,
रखते है तकिये के नीचे ,
अचानक जब नीद खुलती है ,
तो पढने लगते है .......

कुछ किताबो का,
शब्द शब्द पड़ते है ,
बार बार पढते है ,
और रूह तक समां लेते है ,
कुछ किताबो पर ,
रंग बिरंगे निशान लगते है ,
हर वाक्य पर मर मिटते है ,
और कुछ किताबो के,
नाजुक पन्नो पर ,
कापते है, निशान लगाने से भी ......

प्यार करने ,
और किताब पड़ने में ,
कोई फर्क नहीं होता ....
----- सतिंदर सिंह नूर
(translated from punjabi )
.

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